Thursday, 14 October 2021

रात्रि का प्रथम प्रहर

 ये शाम हे की जैसे 
रात्रि का प्रथम प्रहर 
खुल रही है सब दिशा
न जाने क्या उत्कृष्ट हुआ

में सोच कर यह रह गया 
कि कोई ये समझ गया 
क्यूँ चाँद का ग्रहण हुआ 
क्यूँ आसमाँ पिघल गया 
क्यूँ मुझमे में छिपा रहा 
अँधेरा सा बना रहा

ये रात्रि का प्रथम प्रहर 
ओर में चमत्कृत/विस्मित  हो गया

खुल गयी विशिष्ट सी 
ये मंझरे तनिष्क की 
न कोई अब शक रहा 
न कोई रह सकी शुबा

जो सामने आ खड़ा हुआ 
में ओर परिष्कृत हो गया




Monday, 7 December 2020

बारिश के रेले

 बारिश के रेले

ये बूंदे हवा की

ये पानी समंदर का

यादे तुम्हारी


पेड़ो की छाया

ये चंदा का साया

ये चाहत की चादर

ये बाहे तुम्हारी


बलखाती नदिया

ये नदियों का पानी

ये सावन के रेले

ये जुल्फ़े तुम्हारी


बंसी सी मीठी

ये इंजिन की सिटी

ये कोयल सी गाती

ये आहट तुम्हारी


ये घनघोर जंगल

ये आंधी-तूफा की

ये काजल सी काली

ये आंखे तुम्हारी

Wednesday, 16 August 2017

मैं तुम्हारी प्रतीक्षा में

मैं तुम्हारी प्रतीक्षा में
कंदीले जलाकर बैठा हूँ 

अंधियारे में एक 
चिंगारी जमाये बैठा हूँ 

पाज़ेब  खनखना रही हैं 
की तुम आसपास हो 

क्या माजरा है  ऋतम्भरा 
जो तुम स्याह रात हो 

सिलसिले तो रोज है 
हम मिले तो नई  बात हो 

गर तुम हो अँधेरे में 
तो अब अँधेरे में हर रात हो 

उम्मीद है मुझे तुम मिलोगी 
ये जुगनुओ से मेरी बात है 

में तुम्हारी प्रतीक्षा में हूँ
क्योकि तु , मेरी आखरी मुहोब्बत है 

Monday, 7 August 2017

भवरें का फुलों से आखरी स्पंदन है

फुलों के मुरझाते हुए पुष्पंद से
भवरें का ये आखरी स्पंदन है|
ये आखरी मिलन ,आखरी जीवन
आखरी क्षण है|

यूँ तो कई समर हुए है ,
जीवन की गति देखकर ,
पर हर समर में उसकी आखरी मुहोब्बत ,
उसकी आखरी चूभन है|

तूफानी शहतीरों को ताक में रखकर ,
आँधियों की महफ़िलों को राख में करकर ,
वो चूमकर ले आता था ,
खुश्बुओ को पुष्प से|

आज  उसका आखरी मिलन , आखरी जीवन ,
आखरी क्षण है|
भवरे का फूलों से आखरी स्पंदन है|

उस और को ना मूड जाना ऐ पुष्प ,
जहा से तेरा आखरी दृश्य नहीं ,
आखरी परिचय , आखरी लक्ष्य नहीं
ये भवरे का आखरी जाम ही ,
 उसका आखरी वंदन है|

मुरझाते हुए फूलों से ,
भवरे का ये आखरी स्पंदन है|

Friday, 5 May 2017

मैं हूँ मृदंगिनी

न हूर सी
न फुल सी
न काँच सी
न कंट सी
न चाँद सी
न चंद सी

मैं हूँ मृदंगिनी

अंग-अंग में नाचती
नाचती मैं ताल में
पर न ताल हूँ
न काल हूँ
न किंचितों की हार हूँ

हाँ मैं बेमिसाल हूँ

मैं आज हूँ
मैं कल भी हूँ
मैं सोचती हूँ
तो हर कण में हूँ

न चण्ड सी
न चण्डी सी
प्रचण्ड हु तो तांडव सी
न जीवन सी
न मृत्यु सी

मैं हूँ तो घनघोर आंधी सी

जो शौर्य सी
जो गर्व सी
हाथ थामे तो मर्म सी
घुंघरुओं की छनछनाहट सी

हाँ मैं हूँ मृदंगिनी सी







Thursday, 4 May 2017

बदलते भारत की जीवनी

बदलते भारत की जीवनी
आज कलम उठकर बोलेगी

स्वतंत्रता सेनानियों सी
आज मरघट जम  कर  खोलेगी

कोई वेदना सी कही
कोने में ना छुप  कर रोने देगी

बदलते भारत  की जीवनी
कलम उठकर बोलेगी

चंडी सा प्रताप लिये
रक्तबीज को खोलेगी

कही जीवन का निश्चय किये
अभिमान को भी तोड़ेगी

उभरते स्वरुप में
आज भारत माँ भी बोलेगी

बदलते भारत की जीवनी
कलम उठकर बोलेगी

करुणामयी माता सी
झुक झुक कर प्रेम लुटाएगी

ये भारत माँ की लाली
चंद लम्हो में न सिमटेगी

इंकलाब से शब्दों की
गठरी भी वो खोलेगी

भारत माँ की जीवनी
आज कलम उठ -उठकर बोलेगी 

Sunday, 9 April 2017

जो तुम संग आ सको तो चलो

आज कल आँखे ज्यादा बोलती है
जो तुम सुन सको , तो सुनो

इशारो में हर राज़ खोलती है
दिल-ए -जुबा बन कर बतियाती है
मृदङ्गिनी सी आवाज़ है
जो तुम समझ सको , तो समझो

आज कल धड़कने भी झूमने लगी है
दिल में  बासंती रंग लिए
अब और बदमाश हो गयी है

शाम की घनघोर शांति में
चलते हुए शितिज़ तक जाती है
जो तुम दूर तक आ सको , तो चलो

अब ये ख्याल भी चालाक हो गए है
समझते सब है
फिर भी बेबाक हो गए है

समुद्र सी लहरो के पार
इन ख्यालो में सीपिया बहूत है
जो  तुम लूट सको , तो लूट लो

विचारो के पहाड़ो में मै  हीरा ढूंढने निकला हु
जो तुम संग आ सको तो चलो