Wednesday, 16 August 2017

मैं तुम्हारी प्रतीक्षा में

मैं तुम्हारी प्रतीक्षा में
कंदीले जलाकर बैठा हूँ 

अंधियारे में एक 
चिंगारी जमाये बैठा हूँ 

पाज़ेब  खनखना रही हैं 
की तुम आसपास हो 

क्या माजरा है  ऋतम्भरा 
जो तुम स्याह रात हो 

सिलसिले तो रोज है 
हम मिले तो नई  बात हो 

गर तुम हो अँधेरे में 
तो अब अँधेरे में हर रात हो 

उम्मीद है मुझे तुम मिलोगी 
ये जुगनुओ से मेरी बात है 

में तुम्हारी प्रतीक्षा में हूँ
क्योकि तु , मेरी आखरी मुहोब्बत है 

2 comments: