ये शाम हे की जैसे
रात्रि का प्रथम प्रहर
खुल रही है सब दिशा
न जाने क्या उत्कृष्ट हुआ
न जाने क्या उत्कृष्ट हुआ
में सोच कर यह रह गया
कि कोई ये समझ गया
क्यूँ चाँद का ग्रहण हुआ
क्यूँ आसमाँ पिघल गया
क्यूँ मुझमे में छिपा रहा
अँधेरा सा बना रहा
ये रात्रि का प्रथम प्रहर
ओर में चमत्कृत/विस्मित हो गया
खुल गयी विशिष्ट सी
ये मंझरे तनिष्क की
न कोई अब शक रहा
न कोई रह सकी शुबा
जो सामने आ खड़ा हुआ
में ओर परिष्कृत हो गया
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