Thursday, 14 October 2021

रात्रि का प्रथम प्रहर

 ये शाम हे की जैसे 
रात्रि का प्रथम प्रहर 
खुल रही है सब दिशा
न जाने क्या उत्कृष्ट हुआ

में सोच कर यह रह गया 
कि कोई ये समझ गया 
क्यूँ चाँद का ग्रहण हुआ 
क्यूँ आसमाँ पिघल गया 
क्यूँ मुझमे में छिपा रहा 
अँधेरा सा बना रहा

ये रात्रि का प्रथम प्रहर 
ओर में चमत्कृत/विस्मित  हो गया

खुल गयी विशिष्ट सी 
ये मंझरे तनिष्क की 
न कोई अब शक रहा 
न कोई रह सकी शुबा

जो सामने आ खड़ा हुआ 
में ओर परिष्कृत हो गया